साहित्यिक स्रोत

🔘 *साहित्यिक स्रोत* 🔘
     ❇ *ब्राह्मण साहित्य* ❇
🔸⚜ *वेद* ⚜🔸

 

             वेदों की संख्या चार हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, एवं अथर्ववेद। चारों वेदों का सम्मिलित रुप *संहिता* कहलाता हैं। श्रवण परम्परा में सुरक्षित होने के कारण वेदों को

 श्रुति भी कहा जाता है। 
      💮 *ऋग्वेद* 💮
▪ ऋग्वेद में कुल दस मण्डल व 1028 सूक्त है । इनमें 1017 सूक्त व 11 बालखिल्य सूक्त है जो कि हस्तलिखित प्रतियों में परिशिष्ट के रूप में है । बालखिल्य सूक्त आठवें मण्डल में है। ऋक् का शाब्दिक अर्थ 👉 छन्दो और चरणों से युक्त मंत्र। 

▪ ऋग्वेद की रचना 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के बीच मानी जाती हैं। 

▪ ऋग्वेद का पहला व दसवां मण्डल सबसे बाद में जोड़ा गया है। 

▪ ऋग्वेद के दूसरे से सातवें मण्डल को *वंश मण्डल* भी कहा जाता है और वंश मण्डल ही सबसे ज्यादा प्रमाणिक है। वंश मण्डल अग्नि की स्तुति से प्रारम्भ होते हैं । बाद में इंद्र तथा विश्वदेव के मंत्र गाये जाते हैं। 

▪ ऋग्वेद का पहला मण्डल अंगिरा ऋषि को व आठवाँ मण्डल कण्व ऋषि को समर्पित है। 

▪ ऋग्वेद का नवा मण्डल सोम को समर्पित है। 

▪ ऋग्वेद के दूसरे मण्डल में इंद्र की स्तुति, तीसरे मण्डल में विष्णु व अग्नि आदि की स्तुति तथा सातवें मण्डल में पूषन की स्तुति की गई है ।

▪ पृथ्वी सूक्त व गायत्री मंत्र ऋग्वेद में हैं। 

▪आत्मा के आवागमन व निर्गुण ब्रह्म का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में आया है। 

▪ ऋग्वेद का पाठ *होता* नामक पुरोहित करते हैं। 

▪  ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रन्थ है👉 1. ऐतरेय ब्राह्मण   2. कौषीतकी ब्राह्मण  और दो ही उपनिषद ऐतरेय व कौषीतकी है। 

▪ ऋग्वेद के एक मंत्र में रूद्र शिव को त्रयम्बक कहा गया है। एक 

▪ ऋग्वेद में ब्रह्मा का उल्लेख नहीं है। जबकि लक्ष्मी का उल्लेख सर्वप्रथम यहीं से हुआ है। 

▪ ऋग्वेद के दो छन्दो में चार समुद्रों का उल्लेख है। ये है –  अपर, पूर्ण, सरस्वत, शर्यणावत। 
     💮 *सामवेद* 💮
▪ साम काशाब्दिंक अर्थ -गान हैं। इसके 75 सूक्तों को छोड़कर बाकि शेष सभी ऋग्वेद से लिए गये हैं। ये सूक्त गाने योग्य हैं। सामवेद भारतीय संगीत शास्त्र पर प्राचीन पुस्तक है । इसे भारतीय संगीत का जनक माना जाता है। 

▪सामवेद का प्रथम दृष्टा वेद व्यास के शिष्य जैमिनी को माना जाता है ।

▪ सामवेद में मुख्यतः सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं। 
             💮 *यजुर्वेद* 💮
▪ यजुर्वेद गद्य और पद्य दोनों मे लिखा गया है। यह कर्मकाण्ड प्रधान था। इसमें यज्ञ सम्बन्धी सूक्तों का संग्रह है। इसके दो भाग है – शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद। 

▪ शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी संहिता भी कहा जाता है। 

▪ऋग्वेद, सामवेद व यजुर्वेद को त्रयी कहा जाता है। यजु का अर्थ यज्ञ होता है। 

▪ मैत्रेयी संहिता भी यजुर्वेद से सम्बन्धित है। 
          💮 *अथर्ववेद* 💮
▪ इसकी रचना सबसे बाद में हुई है। इसे त्रयी से बाहर रखा गया है। 

▪ अथर्ववेद में जादू टोना, तंत्र मंत्र सम्बन्धी जानकारी है। इसमें औषधविज्ञान तथा लौकिक जीवन के बारे में जानकारी है। 

▪अथर्ववेद में मगध व अंग जैसे पूर्वी क्षेत्रों का उल्लेख है। 

▪अथर्ववेद में परीक्षित को कुरूओं का राजा कहा गया है। 

▪ अथर्ववेद में आर्य व अनार्य विचारों का समन्वय मिलता हैं। 

▪इसका वाचन ब्रह्मा नामक पुरोहित करता था। अतः इसे ब्रह्मवेद भी कहा जाता है। 

▪ अथर्वा नामक ऋषि इसके प्रथम द्रष्टा थे। अतः उन्हीं के नाम पर इसे अथर्ववेद कहते हैं। 
            🔘 *ब्राह्मण* 🔘
▪ वेदों की सरल व्याख्या हेतु ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना गद्य में की गई। ब्रह्म का अर्थ यज्ञ है। अतः यज्ञ के विषयों का प्रतिपादन करने वाले ग्रन्थ ब्राह्मण कहलाये। 

▪ प्रत्येक वेद के अलग अलग ब्राह्मण ग्रन्थ है। वेद स्तुति प्रधान है जबकि ब्राह्मण ग्रन्थ विधि प्रधान है। 

▪ वैदिक भारत के इतिहास के साधन के रूप में ऋग्वेद के साथ शतपथ ब्राह्मण का नाम आता है। 
            🔘 *आरण्यक* 🔘
▪इनमें मंत्रों का गूढ़ एवं रहस्यवादी अर्थ बताया गया है। इनका पाठ एकान्त एवं वन में ही संभव है। जंगल में पढ़े जाने के कारण इन्हें आरण्यक कहा जाता है। कुल सात आरण्यक उपलब्ध है। आरण्यकों से ही कालान्तर में उपनिषदों का विकास हुआ। 
            🔘 *उपनिषद* 🔘
▪उप का अर्थ समीप और निषद् का अर्थ बैठना। उपनिषद वह विद्या हैं जो गुरू के समीप बैठकर एकान्त में सीखी जाती हैं। उपनिषद मुख्यतः ज्ञानमार्गी रचनायें हैं। 

▪ उपनिषदों में पराविद्या (ब्रह्म विद्या) का ज्ञान है। 

▪ उपनिषदों की रचना मध्यकाल तक चलती रही। ऐसा माना जाता है कि अल्लोपनिषद की रचना अकबर के काल में हुई। 

▪ मुक्तिकोपनिषद के अनुसार कुल 108 उपनिषद हैं। 

▪ शंकराचार्य ने दस उपनिषदों पर टीका लिखी है। 

▪उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र तथा गीता को सम्मिलित रुप से प्रस्थान त्रयी कहा जाता है। 

▪केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, तैतिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, कौषीतकी, वृहदारण्यक, श्वेताश्वतर यह कुल 12 उपनिषद ही प्रामाणिक है। 

▪ भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य “सत्यमेव जयते” मुण्डक उपनिषद से लिया गया है। 
           🔘 *वेदांग* 🔘
▪वेदों के अर्थ को सरलता से समझने तथा वैदिक कर्मकाण्डों के प्रतिपादन में सहायतार्थ वेदांग नामक साहित्य की रचना की गयी। वेदांग 6 है। इन्हें गद्य में सुत्र के रूप में लिखा गया है। इन छः ही वेदांगो के नाम तथा क्रम का वर्णन सर्वप्रथम मुण्डकोपनिषद् में मिलता हैं। 👉 शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छन्द, और ज्योतिष। 
🔘 *स्मृतियाँ या धर्म शास्त्र*🔘
▪ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी से लेकर पूर्व मध्य काल तक विभिन्न स्मृति ग्रन्थों की रचना की गई। 

▪ धर्म सूत्रों से ही स्मृति ग्रन्थों का विकास हुआ इसलिए स्मृतियों  को धर्मशास्त्र भी कहा जाता है। इनमें प्रमुख स्मृतियाँ हैं – मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति, बृहस्पति स्मृति, वशिष्ठ स्मृति, कात्यायन स्मृति, गौतम स्मृति, देवल स्मृति आदि। 

▪ विष्णु स्मृति के अतिरिक्त शेष स्मृतियाँ श्लोकों में लिखी गई और इनकी भाषा लौकिक संस्कृत हैं। 
       🔘 *महाकाव्य* 🔘
💮 *महाभारत* 💮

▪ इसकी रचना वेदव्यास ने की थी। इसमें अठारह पर्व हैं। पहले इसमें 8800 श्लोक थे तब इसका नाम जयसंहिता था। 24000 श्लोक होने पर इसका नाम भारत हुआ। गुप्त काल में एक लाख श्लोक होने पर इसे महाभारत (शतसाहस्री संहिता) कहा जाने लगा। 

▪ महाभारत का सर्वप्रथम उल्लेख आश्वलायन गृह सूत्र में हैं। 

▪ महाभारत को पंचम वेद भी कहा गया है। 

▪भगवद् गीता महाभारत के छठें पर्व – भीष्म पर्व का ही भाग है। भगवद् गीता को स्मृति प्रस्थान भी कहा जाता है ।
💮 *रामायण* 💮

▪ इसकी रचना महर्षि वाल्मीकि ने की। इसमें 24000 श्लोक है। अतः इसे चतुर्विशतिसाहस्री संहिता कहा जाता है। इसकी रचना संभवत ईसा पूर्व पाचवीं सदी में शुरू हुई। 

▪ रामायण व महाभारत का अंतिम रुप में संकलन गुप्तकाल में 400 ई. के आस पास हुआ। 

▪रामायण में हमें हिन्दुओं तथा मानों व शवों के संघर्ष का विवरण मिलता हैं। 

▪ रामायण सात काण्डों में विभाजित है –

बाल कांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किंधा कांड, सुन्दर कांड, लंका कांड तथा उत्तर कांड। 
             🔘 *पुराण* 🔘
▪ पुराण का शाब्दिक अर्थ प्राचीन आख्यान होता है। इसमें प्राचीन शासकों की वंशावलियाँ हैं। 

▪ पुराणों में ऐतिहसिक कथाओं का क्रमबद्ध विवरण मिलता हैं। पुराणों के रचयिता लोमहर्ष व उनके पुत्र उग्रश्रवा को माना जाता है। 

▪ पुराणों की संख्या 18 हैं। इनमें *मत्स्य पुराण* सबसे प्राचीन व प्रामाणिक माना जाता है। 

▪ विष्णु पुराण में भारत का वर्णन -” समुद्र के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में जो देश स्थित हैं वह भारत है तथा वहाँ की सन्ताने भारती हैं। ”

▪ मत्स्य, वायु, व विष्णु पुराण में प्राचीन राजवंशों का विवरण मिलता हैं। 

*राजवंश*                *पुराण*

मौर्य वंश          –      विष्णु पुराण

शुंग, सातवाहन –     मत्स्य पुराण

गुप्त वंश          –     वायु पुराण
         

         🔘 *बौद्ध साहित्य* 🔘
▪ सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ त्रिपिटक हैं। इनके नाम है – सुत्त पिटक, विनय पिटक, व अभिधम्म पिटक। ये पाली भाषा में हैं। 

🔅 *सुत्तपिटक* 👉 इसमें बुद्ध के धार्मिक विचारों और वचनों का संग्रह है। यह त्रिपिटकों में सबसे बड़ा एवं श्रेष्ठ है। इसे बौद्ध धर्म का ऐनसाइक्लोपीडिया भी कहा जाता है। सुत्तपिटक 5 निकायों में विभाजित है – दीघ निकाय, मज्झिम निकाय, संयुक्त निकाय, अंगुत्तर निकाय व खुद्दक निकाय। 

▪ जातक कहानियां खुद्दक निकाय का हिस्सा हैं। इसमें बुद्ध के पुर्नजन्म की काल्पनिक कथायें हैं। 

🔅 *विनय पिटक* 👉 इसमें बौद्ध संघ के नियम, आचार विचार, एवं विधिनिषेधों का संग्रह है। इसके भी तीन भाग है – पातिमोक्ख, खन्धक, परिवार। 

🔅 *अभिधम्म पिटक* 👉 यह दार्शनिक सिद्धांतो का संग्रह है। यह सबसे बाद में लिखा गया। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण कथावस्तु है। इसकी रचना तृतीय संगीति के समय मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की। 

▪ इन त्रिपिटकों की रचना बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के बाद हुई। पिटक शब्द का शाब्दिक अर्थ 👉 टोकरी है। 
    🔘 *पाली भाषा के अन्य ग्रन्थ* 🔘

_1. मिलिन्दपन्हो (मिलिन्द प्रश्न)_ – नागसेन द्वारा रचित। इसमें यवन राजा मिनेन्डर व बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य दार्शनिक वार्तालाप का वर्णन। 

_2. दीपवंश और महावंश_ – ये सिंहली अनुश्रतियाँ हैं। आप इनकी रचना क्रमशः चौथी और पाचवीं शताब्दी ई. में हुई। 
        🔘 *संस्कृत में बौद्ध ग्रन्थ* 🔘
▪ महावस्तु व ललित विस्तार में महात्मा बुद्ध के जीवन का वर्णन मिलता हैं। 

*ग्रन्थ*                 *लेखक*

बुद्धचरित       –     अश्वघोष

सौन्दरानन्द     –     अश्वघोष

सारिपुत्र प्रकरण-    अश्वघोष

विभाषाशास्त्र    –    वसुमित्र

पंच भूमि          –     असंग

अभिधर्म समुच्चय –  असंग

माध्यमिककारिका –  नागार्जुन 

युक्ति षष्टिका       –   नागार्जुन 

शतसहस्रिता        –   नागार्जुन 

चतुः शतक          –   आर्यदेव 

शिक्षा समुच्चय     –   शांतिदेव

प्रमाण समुच्चय    –   दिड्गंनाग

विसुद्धिमग्ग         –    बुद्वघोष

▪ललित विस्तार को आधार बनाकर मैथ्यू अरनोल्ड ने Light of Asia लिखा। 

 

           🔘 *जैन साहित्य* 🔘

▪जैन साहित्य को आगम (सिद्धांत) कहा जाता है। आगम के अन्तर्गत 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र, अनुयोग सूत्र, तथा नन्दि सूत्र आते हैं। 

▪आचारांग सूत्र में जैन भिक्षुओं द्वारा पालन किये जाने वाले नियमों का उल्लेख है। 

▪ भगवती सूत्त में महावीर स्वामी की जीवनी हैं। 

▪ उवासगदसाओं में जैन उपासकों के विधि नियमों का संग्रह है। 

▪ जैन ग्रन्थों की रचना प्राकृत भाषा में हुई है। 

▪ कालिकापुराण भी जैन धर्म से सम्बन्धित है। 

▪ भगवती सुत्त में सोलह महाजनपद का उल्लेख है तथा जैन धर्म के सिद्धांत भी मिलते हैं। 
     

🔘 *लौकिक साहित्य* 🔘
▪ भास को कालिदास से पूर्व का प्रथम नाटककार माना जाता है। भास ने 13 नाटक लिखे। 

▪ स्वप्नवासवदत्ता पहला संपूर्ण नाटक माना जाता है। 

▪शूद्रक (गुप्तकाल) ने मृच्छकटिकम नाटक में पहली बार राजपरिवार के स्थान पर समाज के मध्य वर्ग के लोगों को पात्र बनाया। इसमें शुद्र व महिलायें संस्कृत के स्थान पर प्राकृत बोलते हैं। 

▪क्षेमेन्द्र द्वारा रचित वृहत्कथामंजरी। 

▪ गार्गी संहिता शुंग वंश का एक ज्योतिष ग्रन्थ है। 

▪ पद्मगुप्त के नवसाहसांक चरित में परमार वंश के शासक सिंधुराज की जीवनी हैं। 

▪सोमदेव 👉 कथासरित्सागर

▪हरिषेण 👉 वृहत्कथाकोष

▪कामांदक 👉 नीतिसार

▪ भवभुति 👉 मालतिमाधव, उत्तररामचरित, महावीरचरित। 

▪ विशाखदत्त 👉 मुद्राराक्षस, देवीचन्द्रगुप्तम् , सुभाषितावली। 

▪पतंजलि 👉 महाभाष्य

▪मेरूतुंग 👉 प्रबन्ध चिन्तामणि (अर्थशास्त्र पर टीका है) 

▪पंचतंत्र व हितोपदेश नीतिविषयक ग्रन्थ है। विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतंत्र का 50 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

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